भारतीय शेयर बाज़ार का मिज़ाज फिलहाल ‘सावधानी’ और ‘दहशत’ के बीच कहीं अटका हुआ है। Yahoo Finance के मुताबिक, निफ़्टी 50 ने महज एक महीने में 12.4% की वैल्यू गंवा दी है — जो 27 फरवरी को 25,807.2 पर था, वो 30 मार्च 2026 तक लुढ़ककर 22,612.8 पर आ गया। बिकवाली इतनी अंधाधुंध रही है कि ज़्यादातर पोर्टफोलियो मैनेजर्स अब नए मौके तलाशने के बजाय क्लाइंट्स को घाटे की सफाई देने में अपना दिन बिता रहे हैं। FII का पैसा बाहर जाना, हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में भू-राजनीतिक तनाव और डॉलर के मुकाबले रुपये की भारी गिरावट — ये सब मिलकर एक ऐसा बाज़ार बना रहे हैं जहाँ हर कोई भागना चाहता है, रुकना नहीं।
लेकिन इसी उथल-पुथल के बीच ONGC शान से खड़ा है, जिसने इसी मुश्किल महीने के दौरान मज़बूत बढ़त दिखाई है। यह कोई मामूली आंकड़ा नहीं है; इंडेक्स के मुकाबले यह दो अंकों (double-digit) का बड़ा अंतर है, वह भी तब जब बाज़ार के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले शेयर भी अपनी ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मार्च के मध्य में इस शेयर ने तीन महीने के उच्चतम स्तर को छुआ और बाज़ार में गिरावट जारी रहने के बावजूद अपनी बढ़त बरकरार रखी। जनवरी के निचले स्तर से अब तक का इसका सफर, वह भी बाज़ार की इस ‘कुटाई’ के बीच, विस्तार से समझने की ज़रूरत है।
दमन प्रोजेक्ट आखिर क्या बदल रहा है?
इस तेज़ी की मुख्य वजह अरब सागर में स्थित ‘दमन अपसाइड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट’ (Daman Upside Development Project) है। यहाँ गैस उत्पादन शुरू हो चुका है, और बाज़ार इसे ONGC के लिए सिर्फ एक छोटा अपडेट नहीं, बल्कि कंपनी के कुल उत्पादन (volume profile) में एक गेम-चेंजर के रूप में देख रहा है। और यह सोच सही भी है। ONGC के पुराने कुएं सालों से चिंता का विषय रहे हैं — पुराने एसेट्स, गिरता उत्पादन और ऐसा प्रोग्रेस चार्ट जिसे देखकर लॉन्ग-टर्म निवेशक घबरा जाएं। दमन इस समस्या को पूरी तरह खत्म तो नहीं करता, लेकिन कहानी ज़रूर बदल देता है। यह विश्लेषकों को एक ठोस वजह देता है यह कहने की कि अब प्रोडक्शन का भविष्य सिर्फ़ ‘स्लो ब्लीडिंग’ (धीरे-धीरे खत्म होना) नहीं है।
कमोडिटी बाज़ार के इस माहौल में वॉल्यूम ग्रोथ बहुत मायने रखती है। हॉर्मुज का तनाव, ब्रेंट क्रूड की बढ़ती कीमतें और ‘ऑयल शॉक’ की चर्चाओं ने पहले ही कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है, जिसका सीधा फायदा अपस्ट्रीम कंपनियों (तेल निकालने वाली कंपनियों) को मिल रहा है। जब मज़बूत कीमतों के साथ नया उत्पादन भी जुड़ जाए, तो मुनाफे की रफ़्तार काफी बढ़ जाती है। ONGC एक एक्सप्लोरर और प्रोड्यूसर है। इसकी कमाई डॉलर के हिसाब से तय होने वाले कच्चे तेल पर टिकी होती है। रुपये की कमजोरी, जो बाकी कंपनियों की कमर तोड़ रही है और FII को डरा रही है, असल में ONGC की रुपये में होने वाली कमाई के लिए ‘वरदान’ साबित हो रही है। जिस मैक्रो तनाव ने बाकी बाज़ार का दम निकाला हुआ है, वही इस कंपनी के लिए कई मायनों में फायदेमंद साबित हो रहा है।
सीधे शब्दों में कहें तो तेज़ी का तर्क (bull case) एकदम साफ़ है: ऊंची कीमतें, नया उत्पादन, मददगार करेंसी और सरकारी भरोसा वाला बैलेंस शीट, जहाँ निवेशक को किसी जोखिम की चिंता नहीं होती। जब बाज़ार में डर का माहौल होता है, तो निवेशक ठीक इसी कॉम्बिनेशन की तलाश करते हैं — जहाँ कमोडिटी की कीमतों में उछाल हो और कंपनी के प्रोडक्शन में सुधार दिख रहा हो।
वो बात, जिस पर शोर बहुत कम है
यही वो मोड़ है जहाँ मुझे थोड़ी सावधानी बरतने की ज़रूरत लगती है। SAED — यानी स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी, जिसे ‘विंडफॉल टैक्स’ (windfall tax) भी कहा जाता है — इसकी समीक्षा हर 15 दिन में होती है। इतिहास गवाह है कि जब भी ग्लोबल क्रूड की कीमतें आसमान छूती हैं, भारत सरकार SAED के ज़रिए उस अतिरिक्त मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा अपने पास रख लेती है। यह नियम आज भी लागू है। इसकी समीक्षा चुपचाप होती है, हेडलाइंस नहीं बनतीं, और अक्सर प्रोडक्शन की ख़बरों के नीचे दब जाती हैं। लेकिन इसका सीधा असर कंपनी के मार्जिन पर पड़ता है।
अभी बाज़ार ONGC की कीमत इस हिसाब से लगा रहा है कि उसे ‘क्रूड ऑयल शॉक’ का पूरा फायदा मिलेगा। दमन प्रोजेक्ट की खबर ने इस उम्मीद को मज़बूती दी है। लेकिन बाज़ार जिस चीज़ को नज़रअंदाज़ कर रहा है, वो है सरकार की नीति — SAED के ज़रिए मुनाफे को सोख लेना। इससे ONGC की असल कमाई और ब्रेंट क्रूड की उछाल के बीच का रिश्ता टूट सकता है। यह पहले भी हो चुका है। और जिस रफ़्तार से कच्चा तेल बढ़ रहा है, SAED में बदलाव की संभावना काफी ज़्यादा है।
एक और रुकावट है जिसे समझना ज़रूरी है। भारत में घरेलू गैस की कीमतों के लिए एक ‘सीलिंग’ (ऊपरी सीमा) तय है। दमन प्रोजेक्ट मुख्य रूप से एक गैस एसेट है। दमन से मिलने वाली गैस की कीमत इंटरनेशनल स्पॉट मार्केट के हिसाब से नहीं, बल्कि सरकार द्वारा तय की गई सीमा के हिसाब से मिलेगी, जो फिलहाल ग्लोबल कीमतों से काफी नीचे है। तो, नए प्रोडक्शन से होने वाली कमाई भले ही शानदार हो, लेकिन यह वैसी ‘अनलिमिटेड’ कमाई नहीं होगी जैसी ‘ऑयल शॉक’ के नाम पर लोग सोच रहे हैं। इस तेज़ी के पीछे का सबसे कमज़ोर तर्क यही है कि दमन की गैस को ब्रेंट जैसी ऊंची कीमतें मिलेंगी। निवेशकों को यह फर्क बहुत ध्यान से समझना चाहिए।
इसका मतलब यह नहीं है कि ONGC खराब शेयर है। मतलब यह है कि मामला पेचीदा है। निफ़्टी के दो अंकों में गिरने के बावजूद ONGC की मज़बूत बढ़त सच है और इसके पीछे वाजिब कारण भी हैं। दमन प्रोजेक्ट एक असली ट्रिगर है और मैक्रो हालात भी अपस्ट्रीम कंपनियों के पक्ष में हैं। बैंकिंग और आईटी में जो हो रहा है, उसे देखते हुए ONGC जैसे ‘डिफेंसिव’ शेयर की ओर निवेशकों का मुड़ना समझ आता है।
लेकिन इस तेज़ी की कहानी में, जहाँ ONGC हॉर्मुज के संकट के सहारे उड़ान भर रहा है, नीचे एक ‘रेगुलेटरी पेच’ भी है। SAED समीक्षा का शिड्यूल यह नहीं देखता कि निवेशक ने कितना दांव लगाया है। ब्रेंट कितना भी ऊपर जाए, गैस प्राइस की लिमिट रातों-रात नहीं पिघलती। ये निवेश से भागने की वजहें नहीं हैं, बल्कि यह समझने की वजहें हैं कि आप असल में क्या खरीद रहे हैं और कितना जोखिम ले रहे हैं।
जनवरी से मार्च तक का चार्ट देखें, तो पता चलता है कि यह शेयर जनवरी-फरवरी में सुस्त था, लेकिन मार्च में प्रोडक्शन की खबर और बाज़ार की गिरावट के बीच इसने तेज़ी पकड़ी। निफ़्टी के धराशायी होने के बावजूद यह उछाल किसी ‘सेक्टर रोटेशन’ का शोर नहीं है, बल्कि यह शेयर अपनी अलग ही चाल चल रहा है।
ONGC का भविष्य अब उन दो चीज़ों पर निर्भर है जो पूरी तरह कंपनी के हाथ में नहीं हैं: अगली समीक्षा में सरकार विंडफॉल टैक्स (SAED) को कितना बढ़ाती है, और हॉर्मुज का संकट कच्चे तेल को कब तक उबाल पर रखता है। ये दोनों बातें नतीजों से पहले ही पता चल जाएंगी, लेकिन फिलहाल ONGC की तेज़ी की चर्चा में इन्हें कम आंका जा रहा है।
सरकार ही कंपनी की मालिक है, और सरकार ही टैक्स भी लगाती है। अब जब ये दोनों हित आपस में टकराते हैं, तो हर कोई ऐसे हैरान होता है जैसे कुछ अनहोनी हो गई हो — भाई साहब, ये बाज़ार की कोई कमी नहीं है, सरकारी तेल कंपनियों में यह तो ‘नॉर्मल’ बात है। जो निवेशक इसे भूल जाते हैं, वही बाद में इसे ‘धोखा’ करार देते हैं।